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Saturday, December 19, 2015

हबीब जालिब की नज़्म “कॉफ़ी-हाउस”



दिन-भर कॉफ़ी-हाउस में बैठे कुछ दुबले-पतले नक़्क़ाद*
बहस यही करते रहते हैं सुस्त अदब की है रफ़्तार
सिर्फ़ अदब के ग़म में ग़लताँ* चलने फिरने से लाचार
चेहरों से ज़ाहिर होता है जैसे बरसों के बीमार
उर्दू-अदब में ढाई हैं शायर ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ आधा ‘जोश’
या इक-आध किसी का मिस्रा या ‘इक़बाल’ के चंद अशआर
या फिर नज़्म है इक चूहे पर हामिद-‘मदनी’ का शहकार*
कोई नहीं है अच्छा शायर कोई नहीं अफ़्साना-निगार*
‘मंटो’ ‘कृष्ण’ ‘नदीम’ और ‘बेदी’ इन में जान तो है लेकिन
ऐब ये है इन के हाथों में कुंद ज़बाँ की है तलवार
‘आली’ अफ़सर ‘इंशा’ बाबू ‘नासिर’ ‘मीर’ के बर-ख़ुरदार
‘फ़ैज़’ ने जो अब तक लिक्खा है क्या लिक्खा है सब बे-कार
उन को अदब की सेह्हत का ग़म मुझ को उन की सेह्हत का
ये बेचारे दुख के मारे जीने से हैं क्यूँ बे-ज़ार*
हुस्न से वहशत* इश्क़ से नफ़रत अपनी ही सूरत से प्यार
ख़ंदा-ए-गुल पर एक तबस्सुम गिर्या-ए-शबनम* से इंकार
------------------------------------------------------------
*नक़्क़ाद – आलोचक
*ग़लताँ – लोटना
*शहकार – श्रेष्ठ कृति
*अफ़्साना-निगार – कहानीकार
*बे-ज़ार – ऊबे हुए
*वहशत – डर
*ख़ंदा-ए-गुल – फूल की हँसी
*तबस्सुम – मुस्कान
*गिर्या-ए-शबनम – ओस का दु:ख
साभार- https://rekhta.org/

Tuesday, July 7, 2015

अल सल्‍वाडोर के क्रान्तिकारी कवि रोके दाल्‍तोन की कविता - तुम्‍हारी तरह

तुम्हारी तरह
मैं भी प्यार करता हूँ 
प्यार से, ज़‍िन्दगी से, 
चीज़ों की भीनी-भीनी खुशबू से, 
जनवरी के दिनों के आसमानी भूदृश्‍यों से। 

मेरा ख़ून भी खौलता है 
और मैं हँसता हूँ उन आँखों से 
जिन्‍हें पता है आँसुओं का किनारा

मुझे यकीन है कि दुनिया ख़ूबसूरत है 
और यह कि रोटी की तरह 
कविता भी सबके लिए है।

और यह भी कि मेरी रगें मुझमें नहीं
उन तमाम लोगों के एकदिल लहू में ख़त्‍म होती हैं
जो लड़ रहे हैं ज़‍िन्दगी के लिए, 
प्यार के लिए, 
चीज़ों के लिए,
भूदृश्‍यों और रोटी के लिए,
सबकी कविता के लिए।

अनुवाद - आनन्‍द सिंह (अक्षय काळे के मार्गदर्शन में)

Wednesday, April 1, 2015

विजयी लोग - पाब्‍लो नेरूदा की कविता


मैं दिल से इस संघर्ष के साथ हूँ
मेरे लोग जीतेंगे
एक-एक कर सारे लोग जीतेंगे


इन दु:खों को
रूमाल की तरह तब-तक निचोड़ा जाता रहेगा
जब-तक कि सारे आँसू
रेत के गलियारों पर
कब्रों पर
मनुष्‍य की शहादत की सीढ़ियों पर
गिर कर सूख नहीं जाएँ
पर, विजय का क्षण नज़दीक है
इसीलिए घृणा को अपना काम करने दो
ताकि दण्‍ड देने वाले हाथ
काँपें नहीं
समय के हाथ को अपने लक्ष्‍य तक
पहुँचने दो अपनी पूरी गति में
और लोगों को भरने दो ये खाली सड़कें
नये सुनिश्चित आयामों के साथ

यही है मेरी चाहत इस समय के लिए
तुम्‍हें पता चल जायेगा इसका
मेरा कोई और एजेण्‍डा नहीं है

- पाब्‍लो नेरूदा
-अनुवाद - रामकृष्‍ण पाण्‍डेय
(परिकल्‍पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संकलन 'जब मैं जड़ों के बीच रहता हूँ' से साभार)

जीना - नाज़िम हिकमत की कविता

जीना कोई हँसी-मजाक की चीज़ नहीं,
तुम्‍हें इसे संजीदगी से लेना चाहिए।
इतना अधिक और इस हद तक
कि, जैसे मिसाल के तौर पर, जब तुम्‍हारे हाथ बँधे हों
तुम्‍हारी पीठ के पीछे,
और तुम्‍हारी पीठ लगी हो दीवार से
या फिर, प्रयोगशाला में अपना सफेद कोट पहने
और सुरक्षा-चश्‍मा लगाये हुए भी,
तुम लोगों के लिए मर सकते हो --
यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जिनके चेहरे
तुमने कभी देखे न हों,


हालाँकि तुम जानते हो कि जीना ही
सबसे वा‍स्‍तविक, सबसे सुन्‍दर चीज है।
मेरा मतलब है, तुम्‍हें जीने को इतनी
गम्‍भीरता से लेना चाहिए
कि जैसे, मिसाल के तौर पर, सत्‍तर की उम्र में भी
तुम जैतून के पौधे लगाओ -- 
और ऐसा भी नहीं कि अपने बच्‍चों के लिए,
लेकिन इसलिए, हालाँकि तुम मौत से डरते हो
तुम विश्‍वास नहीं करते इस बात का,
इसलिए जीना, मेरा मतलब है, ज्‍यादा कठिन होता है।

- नाज़िम हिकमत

Wednesday, July 23, 2014

मेरे जूते को बचाकर रखना - गाज़ा नरसंहार पर एक मार्मिक कविता

गाज़ा में इज़रायली बमबारी से ढाये जा रहे क़हर की सबसे ह्रदय विदारक तस्‍वीरों में एक बच्‍चे के खून से सने जूते की तस्‍वीर भी थी जो शायद बमबारी में मारा गया था। Musab Iqbal ने इस पर अंग्रेज़ी में एक मार्मिक कविता लिखी थी जिसको हिन्‍दी के पाठकों तक पहुँचाने के लिए मैंने इस कविता का हिन्‍दी अनुवाद किया है:

मेरे जूते को बचाकर रखना
संभालकर रखना इसे कल के लिए
मलबे के बीच दम तोड़ रहे कल के लिए
मेरे जूते को बचाकर रखना
ग़म के संग्रहालय के लिए
उस संग्रहालय के लिए मैं दे रहा हूं अपने जूते को,
खू़न से सने जूते को
और हताशा में डूबे मेरे शब्‍दों को
और उम्‍मीद से लबरेज़ मेरे आंसुओं को
और सन्‍नाटे में डूबे मेरे दर्द को
समुद्र के किनारे से मेरे फुटबाल को भी उठा लेना,
या शायद उसके कुछ हिस्‍सों को जिन पर खून के धब्‍बे नहीं
एक महाशक्ति की कायरता के दस्‍तख़त हैं
मेरी स्‍मृति उस बम की खोल में सीलबन्‍द है
शोक की प्रतिध्‍वनि में, विदाई के चुंबन में
ज़ि‍न्‍द‍गी का हर रंग ज़हरीला है
और जानलेवा रसायनों के बादल हर ख्‍़वाब का दम घोट रहे हैं
वे तस्‍वीरें जो तुम्‍हें रात में परेशान करती हैं
और दिन में जब तुम हमारे बारे में पढ़ते हो (आराम फ़रमाते हुए)
वे तस्‍वीरें हमें परेशान नहीं करती हैं
अगर कोई चीज़ परेशान करती है तो वह है
तुम्‍हारी ख़ामोशी, तुम्‍हारी शिथि‍लता
तुम्‍हारी विचारवान निगाहें, तुम्‍हारा गुनहगार इंतज़ार
यहाँ आक्रोश एक सद्गुण है,
हमारा धैर्य हमारे प्रतिरोध में दर्ज़ है!

  
अनुवाद - अानन्‍द सिंह
अंग्रेज़ी की मूल कविता यहां प‍ढी़ जा सकती है। 

Saturday, June 21, 2014

मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' का एक अंश

सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं
उनके ख़याल से यह सब गप है
मात्र किंवदन्ती।
रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग
नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।
प्रश्न की उथली-सी पहचान
राह से अनजान
वाक् रुदन्ती।
चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,...

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये
समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।
गढ़े जाते संवाद,
गढ़ी जाती समीक्षा,
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूर।
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
किराये के विचारों का उद्भास।
बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।
नपुंसक श्रद्धा
सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी...

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार
द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,
एक स्पिलट सेकेण्ड में शत साक्षात्कार।
टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।
रक्त में बहती हैं शान की किरनें
विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी...


Tuesday, June 17, 2014

जो बोलते हो उसे सुनो भी - बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट

अध्‍यापक, अक्‍सर मत कहो कि तुम सही हो
छात्रों को उसे महसूस कर लेने दो खुद-ब-ख्‍ाुद
सच को थोपो मत:
यह ठीक नहीं है सच के हक़ में
बोलते हो जो उसे सुनो भी।
- ('परिकल्‍पना' द्वारा प्रकाशित 'बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट: इकहत्‍तर कविताएं और तीस छोटी कहानियां' से)

Monday, June 9, 2014

हबीब जालिब की कविता - जु़ल्‍मत को जिया



हबीब जालिब ने यह कविता जिया कालीन पाकिस्‍तान के सन्‍दर्भ में लिखी थी।
मोदी कालीन भारत के बारे में भी यह कविता सटीक बैठती है।

हक़ बात पे कोड़े और ज़‍िन्‍दां
बातिल के शिकंजे में है ये जां
इन्‍सां हैं कि सहमे बैठे हैं
खूँखार दरिंदे हैं रक्‍सां 
इस जु़ल्‍मो-सितम को लुफ़्त-ओ-करम
इस दुख को दवा क्‍या लिखना 
जु़ल्‍मत को जिया, सर सर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना, क्‍या लिखना
हर शाम यहां शाम-ए-वीरां आसेब ज़दा रस्‍ते गलियां 
जिस शहर की धुन में निकले थे
वो शहर दिल-ए-बरबाद कहां
सेहरा को चमन
बन को गुलशन
बादल को रिदा क्‍या लिखना
जु़ल्‍मत को जिया, सरसर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना

एे मेरे वतन के फ़नकारों
ज़ुल्‍मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल सराओं के वासी
क़ातिल हैं सभी अपने यारों
विरसे में हमें ये ग़म है मिला
इस ग़म को नया क्‍या लिखना
जु़ल्‍मत को जिया, सरसर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना





Speak the truth and you will be flogged and imprisoned
This life is caught in the grip of lies,
Human beings are cowering  in terror,
While blood thirsty monsters are on the rampage.
How can this cruelty be called kindness,
How can I write this disease as a cure?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.


Every evening  here is  one of desolation
Every road and alley is struck by calamity,
With hope in our hearts we searched for a city,
Where is that city now, my devastated heart?
How can this desert be called as a rose garden,
This cloud as a silver lining?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.



Oh fellow artists of my homeland!
Don’t sacrifice your art to this darkness,
These people who live in palaces,
 All are murderers, my comrades.           
We have inherited this grief from the past,
How can I write of this grief as a new one ?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.

Saturday, July 20, 2013

ये किसका लहू है कौन मरा…

ऐ रहबरे-मुल्को-कौम बता
आँखें तो उठा नज़रें तो मिला
कुछ हम भी सुने हमको भी बता
ये किसका लहू है कौन मरा…

धरती की सुलगती छाती पर
बेचैन शरारे पूछते हैं
हम लोग जिन्हें अपना न सके
वे खून के धारे पूछते हैं
सड़कों की जुबां चिल्लाती है
सागर के किनारे पूछते है|
ये किसका लहू है कौन मरा…

ऐ अज़्मे-फना देने वालो
पैगामे-वफ़ा देने वालो
अब आग से क्यूँ कतराते हो
मौजों को हवा देने वालो
तूफ़ान से अब क्यूँ डरते हो
शोलों को हवा देने वालो
क्या भूल गए अपना नारा
ये किसका लहू है कौन मरा

हम ठान चुके हैं अब जी में
हर जालिम से टकरायेंगे
तुम समझौते की आस रखो
हम आगे बढ़ते जायेंगे
हम मंजिले-आज़ादी की कसम
हर मंजिल पे दोहराएँगे
ये किसका लहू है कौन मरा…

–साहिर लुधियानवी
(1946 के नौसेना विद्रोह के समय लिखी नज़्म)

Thursday, August 16, 2012

देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

भगतसिंह इस बार ना लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे
बम्ब-सम्ब को छोडो भाषण दिया तो पकड़े जाओगे
निकला है कानून नया चुटकी बजते बंध जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो सीधे मुक्ति पाओगे
कांग्रेस का हुक्म, जरूरत क्या वारंट तलाशी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की! 

मत समझो पूजे जाओगे
क्योंकि लड़े थे दुश्मन से रुत ऐसी है
अब दिल्ली की आँख लड़ी है लन्दन से,
कामनवेल्थ कुटुंब देश को खीँच रहा है मंतर से
प्रेम विभोर हुए नेतागण , रस बरसा है अम्बर से
योगी हुए वियोगी दुनिया बदल गयी बनवासी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

गढ़वाली जिसने अंग्रेजी शासन में विद्रोह किया
वीर क्रांति के दूत, जिन्होंने नहीं जान का मोह किया
अब भी जेलों में सड़ते हैं न्यू माडल आजादी है
बैठ गए हैं काले, पर गोरे जुल्मों की गादी है
वही रीत है वही नाट है, गोरे सत्यानासी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

सत्य अहिंसा का शासन है रामराज्य फिर आया है
भेड़-भेडिये एक घाट हैं, सब इश्वर की माया है
दुश्मन हे जज अपना, टीपू जैसों का क्या करना है
शांति सुरक्षा की खातिर हर हिम्मतवर से डरना है
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झांसी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

                                                          -शंकर शैलेन्द्र

Sunday, August 12, 2012

कचोटती स्वतन्त्रता – तुर्की के महान कवि नाज़िम हिकमत की कविता

तुम खर्च करते हो अपनी आँखों का शऊर,
अपने हाथों की जगमगाती मेहनत,
और गूँधते हो आटा दर्जनों रोटियों के लिए काफी
मगर ख़ुद एक भी कौर नहीं चख पाते;
तुम स्वतंत्र हो दूसरों के वास्ते खटने के लिए
अमीरों को और अमीर बनाने के लिए
तुम स्वतंत्र हो।

जन्म लेते ही तुम्हारे चारों ओर
वे गाड़ देते हैं झूठ कातने वाली तकलियाँ
जो जीवनभर के लिए लपेट देती हैं
तुम्हें झूठों के जाल में।
अपनी महान स्वतंत्रता के साथ
सिर पर हाथ धरे सोचते हो तुम
ज़मीर की आज़ादी के लिए तुम स्वतंत्र हो।

तुम्हारा सिर झुका हुआ मानो आधा कटा हो
गर्दन से,
लुंज-पुंज लटकती हैं बाँहें,
यहाँ-वहाँ भटकते हो तुम
अपनी महान स्वतंत्रता में:
बेरोज़गार रहने की आज़ादी के साथ
तुम स्वतंत्र हो।

तुम प्यार करते हो देश को
सबसे करीबी, सबसे क़ीमती चीज़ के समान।
लेकिन एक दिन, वे उसे बेच देंगे,
उदाहरण के लिए अमेरिका को
साथ में तुम्हें भी, तुम्हारी महान आज़ादी समेत
सैनिक अड्डा बन जाने के लिए तुम स्वतंत्र हो।
तुम दावा कर सकते हो कि तुम नहीं हो
महज़ एक औज़ार, एक संख्या या एक कड़ी
बल्कि एक जीता-जागता इंसान
वे फौरन हथकड़ियाँ जड़ देंगे
तुम्हारी कलाइयों पर।
गिरफ्तार होने, जेल जाने
या फिर फाँसी चढ़ जाने के लिए
तुम स्वतंत्र हो।

नहीं है तुम्हारे जीवन में लोहे, काठ
या टाट का भी परदा;
स्वतंत्रता का वरण करने की कोई ज़रूरत नहीं :
तुम तो हो ही स्वतंत्र।
मगर तारों की छाँह के नीचे
इस किस्‍म की स्वतंत्रता कचोटती है।

Thursday, May 3, 2012

नफ़स नफ़स, कदम कदम

नफ़स नफ़स, कदम कदम
बस एक फ़िक्र दम-बदम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

जहाँ अवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हो जान से
जहाँ पे लफ़्ज-ए-अम्‍न एक खौफ़नाक राज़ हो
जहाँ कबूतरों का सर परस्त एक बाज़ हो
वहाँ ना चुप रहेंगे हम
कहेंगे, हाँ कहेंगे हम
हमारा हक़, हमारा हक़ हमें जनाब! चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए !
ज़बाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

यकीन आँख मूँदकर किया था जिन पे जान कर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तानकर
उन्‍हीं की सरहदों में कै़द हैं हमारी बोलियाँ
वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियाँ।
जो इनका भेद खोल दे
हर एक बात बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बे-वतन
उन्‍हीं की आह बे-असर उन्‍हीं की लाश बे-कफ़न
लहू पसीना बेच कर जो पेट तक न भर सकें
करें तो क्‍या करें भला, न जी सकें न मर सकें
सियाह ज़िन्‍दगी के नाम
जिनकी हर सुबह ओ शाम
उनके आसमाँ को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिये!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !


होशियार ! कह रहा लहू के रंग का निशान !
ऐ किसान! होशियार! होशियार! नौजवान!
होशियार! दुश्‍मनों की दाल अब गले नहीं!
सफेदपोश रहज़नों की चाल अब चले नहीं!
जो इनका सर मरोड़ दे
गु़रूर इनका तोड़ दे
वो सरफ़रोश आरज़ू वही शबाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए ,
ज़बाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए |
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्‍व़ाब क्‍या हुए
तुझे था जिनका इन्‍तज़ार वो जवाब क्‍या हुए
तू उनकी झूठी बात पर कभी न एतबार कर
कि तुझ को साँस साँस का सही हिसाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए ,
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए |
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

-शलभ श्रीराम सिंह

Friday, February 3, 2012

लड़ाई जारी है...

जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।
यह जो छापा तिलक लगाए और जनेऊधारी है
यह जो जात पॉत पूजक है यह जो भ्रष्टाचारी है
यह जो भूपति कहलाता है जिसकी साहूकारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी  तैयारी है।

यह जो तिलक मांगता है, लडके की धौंस जमाता है
कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नरक बनाता है
पैसे के बल पर यह जो अनमेल ब्याह रचाता है
यह जो अन्यायी है सब कुछ ताकत से हथियाता है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।

यह जो काला धन फैला है, यह जो चोरबाजारी है
सत्ता पाँव चूमती जिसके यह जो सरमाएदारी है
यह जो यम-सा नेता है, मतदाता की लाचारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।
जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।

-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

Wednesday, November 2, 2011

धीमी मौत


जो बन जाते हैं आदत के ग़ुलाम,
चलते रहते हैं रोज़ उन्‍हीं राहों पर,
बदलती नहीं जिनकी कभी रफ़्तार,
जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते,
और बातें नहीं करते अनजान लोगों से,
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो रहते हैं दूर आवेगों से,
भाती है जिन्‍हें सियाही उजाले से ज़्यादा,
जिनका 'मैं' बेदखल कर देता है उन भावनाओं को,
जो चमक भरती हैं तुम्‍हारी आँखों में,
उबासियों को मुस्कान में बदल देती हैं,
ग़लतियों और दु:खों से उबारती हैं हृदय को,
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो उलट-पुलट नहीं देते सबकुछ
जब काम हो जाए बोझिल और उबाऊ,
किसी सपने के पीछे भागने की ख़ातिर
चल नहीं पड़ते अनजान राहों पर,
जो ज़ि‍न्‍दगी में कभी एक बार भी,
समझदारी भरी सलाह से बचकर भागते नहीं,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो निकलते नहीं यात्राओं पर,
जो पढ़ते नहीं,
नहीं सुनते संगीत,
ढूँढ़ नहीं पाते अपने भीतर की लय,
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो ख़त्‍म कर डालते हैं ख़ुद अपने प्रेम को,
थामते नहीं मदद के लिए बढ़े हाथ,
जिनके दिन बीतते हैं
अपनी बदकिस्‍मती या
कभी न रुकने वाली बारिश की शिकायतों में
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो कोई परियोजना शुरू करने से पहले ही छोड़ जाते हैं,
अपरिचित विषयों के बारे में पूछते नहीं सवाल,
और चुप रहते हैं उन चीज़ों के बारे में पूछने पर
जिन्‍हें वे जानते हैं,
वे मरते हैं धीमी मौत।

किश्‍तों में मरते चले जाने से बचना है
तो याद रखना होगा हमेशा
कि ज़ि‍न्‍दा रहने के लिए काफ़ी नहीं बस साँस लेते रहना,
कि एक प्रज्‍ज्वल धैर्य ही ले जाएगा हमें
एक जाज्‍वल्‍यमान सुख की ओर।

-- पाब्‍लो नेरूदा

Friday, October 21, 2011

आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख़्‍वाब हैं

दुनिया के हर सवाल के हम ही जवाब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख़्‍वाब हैं।
इन बाजुओं ने साथी ये दुनिया बनायी है
काटा है जंगलों को,बस्‍ती बसाई है
जांगर खटा के खेतों में फसलें उगाई हैं
सड़कें निकाली हैं अटारी उठाई है
ये बांध बनाये हैं फ़ैक्‍टरी बनाई है
हम बेमिसाल हैं हम लाजवाब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख़्‍वाब हैं।
अब फिर नया संसार बनाना है हमें ही
नामों-निशां सितम का मिटाना है हमें ही
अब आग में से फूल खिलाना है हमें ही
फिर से अमन का गीत सुनाना है हमें ही
हम आने वाले कल के आफताबे-इन्‍क़लाब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख्‍़वाब हैं।
हक़ के लिये अब जंग छेड़ दो दोस्‍तो
जंग बन के फूल उगेगा दोस्‍तो
बच्‍चों की हंसी को ये खिलायेगा दोस्‍तो
प्‍यारे वतन को स्‍वर्ग बनायेगा दोस्‍तो
हम आने वाले कल की इक खुली किताब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख्‍़वाब हैं।

-शशि प्रकाश

Wednesday, August 31, 2011

Which side are you on? :: by Pete Seeger

Which side are you on boys?
Which side are you on?
Which side are you on boys?
Which side are you on?

They say in Harlan County
There are no neutrals there.
You'll either be a union man
Or a thug for J. H. Blair.

Which side are you on boys?
Which side are you on?
Which side are you on boys?
Which side are you on?

My dady was a miner,
And I'm a miner's son,
He'll be with you fellow workers
Until this battle's won.

Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?

Oh workers can you stand it?
Oh tell me how you can?
Will you be a lousy scab
Or will you be a man?

Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?

Come all you good workers,
Good news to you I'll tell
Of how the good old union
Has come in here to dwell.

Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?

Tuesday, August 30, 2011

शहीदों के लिए

ज़ि‍न्‍दगी लड़ती रहेगी, गाती रहेगी
नदियाँ बहती रहेंगी
कारवाँ चलता रहेगा, चलता रहेगा, बढ़ता रहेगा
मुक्ति की राह पर
छोड़कर साथियो, तुमको धरती की गोद में।

खो गये तुम हवा बनकर वतन की हर साँस में
बिक चुकी इन वादियों में गन्‍ध बनकर घुल गये
भूख से लड़ते हुए बच्‍चों की घायल आस में
कर्ज़ में डूबी हुई फसलों की रंगत बन गये

ख्‍़वाबों के साथ तेरे चलता रहेगा...

हो गये कुर्बान जिस मिट्टी की खातिर साथियो
सो रहो अब आज उस ममतामयी की गोद में
मुक्ति के दिन तक फ़िज़ाँ में खो चुकेंगे नाम तेरे
देश के हर नाम में ज़ि‍न्‍दा रहोगे साथियो

यादों के साथ तेरे चलता रहेगा...

जब कभी भी लौट कर इन राहों से गुज़रेंगे हम
जीत के सब गीत कई-कई बार हम फिर गायेंगे
खोज कैसे पायेंगे मिट्टी तुम्‍हारी साथियो
ज़र्रे-ज़र्रे को तुम्‍हारी ही समाधि पायेंगे

लेकर ये अरमाँ दिल में चलता रहेगा...


Thursday, June 16, 2011

बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूँजीपतिया...


बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूँजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए
अपने महलिया में करे उजियरवा
कि बिजरी के रडवा जराए-जराए

कत्तो बने भिटवा कतहुँ बने गढ़ई
कत्तो बने महल कतहुँ बने मड़ई
मटिया के दियना तूहीं त बुझवाया
कि सोनवा के बेनवा डोलाए-डोलाए

मिलया में खून जरे खेत में पसीनवा
तबहुं न मिलिहैं पेट भर दनवा
अपनी गोदमिया तूहीं त भरवाया
कि बड़े-बड़े बोरवा सियाए-सिआए

राम अउर रहीम के ताके पे धइके लाला
खोई के ईमनवा बटोरे धन काला
देसवा के हमरे तू लूट के खाय
कई गुना दमवा बढ़ाए-बढ़ाए

जे त करे काम, छोट कहलावे
ऊ बा बड़ मन जे जतन बतावे
दस के सासनवा नब्बे पे करवावे
इहे परिपटिया चलाए-चलाए

जुड़ होई छतिया तनिक दऊ बरसा
अब त महलिया में खुलिहैं मदरसा
दुखिया के लरिका पढ़े बदे जइहैं
छोट-बड़ टोलिया बनाए-बनाए

बिनु काटे भिंटवा गड़हिया न पटिहैं
अपने खुसी से धन-धरती न बटिहैं
जनता केतलवा तिजोरिया पे लगिहैं
कि महल में बजना बजाए-बजाए

बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूँजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए।

                                       - जमुई  खाँ आज़ाद 

Thursday, April 28, 2011

हम वो इंक़लाब हैं!!!


रुके न जो, झुके न जो, दबे न जो,मिटे न जो
हम वो इंक़लाब हैं,ज़ुल्म का जवाब हैं
हर शहीद का,गरीब का हमीं तो ख़्वाब हैं।

तख़्त और ताज को, कल के लिए आज को
जिसमें ऊंच-नीच है ऐसे हर समाज को
हम बदल के ही रहेंगे वक़्त के मिजाज़ को

क्रांति कि मांग है, जंगलों में आग है
दासता की बेड़ियों को तोड़ते बढ़ जायेंगे .
लड़ रहे हैं इसलिए की प्यार जग में जी सके
आदमी का खून कोई आदमी न पी सके

मालिकों- मजूर के,
नौकरों हुजूर के
भेद हम मिटायेंगे, समानता को लायेंगे.

जानते नहीं हैं फ़र्क हिन्दू-मुसलमान का
मानते हैं रिश्ता इंसान से इंसान का
धर्म के देश के, भाषा के भेष के
फ़र्क को मिटायेंगे, समानता को लायेंगे

हुक्म चल सकेगा नहीं ज़ुल्मी हुक्मरान का
सारे जग पे हक हमारा, हम पे इस जहाँ का
गरीब को जगायेंगे, गरीबी को मिटायेंगे
एकता के जोर पे हर ज़ुल्म से लड़ जायेंगे.

रुके न जो, झुके न जो, दबे न जो, मिटे न जो
हम वो इंक़लाब हैं,ज़ुल्म का जवाब हैं
हर शहीद का,गरीब का हमीं तो ख़्वाब हैं।

--छात्र युवा संघर्ष वाहिनी

Sunday, April 10, 2011

शिखरों तक जाने के लिए

कौवाउड़ान दूरियाँ तय करके
संभव नहीं
इन शिखरों तक  पहुँच पाना.
इन तक पहुँचने की
दुर्गम, कठिन, सर्पिल
चढाव-उतार भरी
राहों को जानना होगा.
यात्राओं के लम्बे अनुभव
होने चाहिए-
सफल और असफल दोनों ही,
एकदम ज़िन्दगी की तरह 
चाहे वह आदमी की हो
या फिर किसी कौम की. 

--शशि प्रकाश