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Monday, June 9, 2014

हबीब जालिब की कविता - जु़ल्‍मत को जिया



हबीब जालिब ने यह कविता जिया कालीन पाकिस्‍तान के सन्‍दर्भ में लिखी थी।
मोदी कालीन भारत के बारे में भी यह कविता सटीक बैठती है।

हक़ बात पे कोड़े और ज़‍िन्‍दां
बातिल के शिकंजे में है ये जां
इन्‍सां हैं कि सहमे बैठे हैं
खूँखार दरिंदे हैं रक्‍सां 
इस जु़ल्‍मो-सितम को लुफ़्त-ओ-करम
इस दुख को दवा क्‍या लिखना 
जु़ल्‍मत को जिया, सर सर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना, क्‍या लिखना
हर शाम यहां शाम-ए-वीरां आसेब ज़दा रस्‍ते गलियां 
जिस शहर की धुन में निकले थे
वो शहर दिल-ए-बरबाद कहां
सेहरा को चमन
बन को गुलशन
बादल को रिदा क्‍या लिखना
जु़ल्‍मत को जिया, सरसर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना

एे मेरे वतन के फ़नकारों
ज़ुल्‍मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल सराओं के वासी
क़ातिल हैं सभी अपने यारों
विरसे में हमें ये ग़म है मिला
इस ग़म को नया क्‍या लिखना
जु़ल्‍मत को जिया, सरसर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना





Speak the truth and you will be flogged and imprisoned
This life is caught in the grip of lies,
Human beings are cowering  in terror,
While blood thirsty monsters are on the rampage.
How can this cruelty be called kindness,
How can I write this disease as a cure?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.


Every evening  here is  one of desolation
Every road and alley is struck by calamity,
With hope in our hearts we searched for a city,
Where is that city now, my devastated heart?
How can this desert be called as a rose garden,
This cloud as a silver lining?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.



Oh fellow artists of my homeland!
Don’t sacrifice your art to this darkness,
These people who live in palaces,
 All are murderers, my comrades.           
We have inherited this grief from the past,
How can I write of this grief as a new one ?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.

2 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन पेड़ों के दर्द को क्यों नही समझते हम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Mallinath said...

मोदी कालीन भारत के बारे में भी यह कविता सटीक बैठती है।

कैसे ? मोदीकालीन भारत के अब तक कुछ सो ही दिन बीते हैं। इन सो दिनों मे ज़िया-उल-हक जैसा मोदीसाहब ने किसी पर ज़ुल्म किया है ?

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