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Thursday, May 3, 2012

नफ़स नफ़स, कदम कदम

नफ़स नफ़स, कदम कदम
बस एक फ़िक्र दम-बदम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

जहाँ अवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हो जान से
जहाँ पे लफ़्ज-ए-अम्‍न एक खौफ़नाक राज़ हो
जहाँ कबूतरों का सर परस्त एक बाज़ हो
वहाँ ना चुप रहेंगे हम
कहेंगे, हाँ कहेंगे हम
हमारा हक़, हमारा हक़ हमें जनाब! चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए !
ज़बाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

यकीन आँख मूँदकर किया था जिन पे जान कर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तानकर
उन्‍हीं की सरहदों में कै़द हैं हमारी बोलियाँ
वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियाँ।
जो इनका भेद खोल दे
हर एक बात बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बे-वतन
उन्‍हीं की आह बे-असर उन्‍हीं की लाश बे-कफ़न
लहू पसीना बेच कर जो पेट तक न भर सकें
करें तो क्‍या करें भला, न जी सकें न मर सकें
सियाह ज़िन्‍दगी के नाम
जिनकी हर सुबह ओ शाम
उनके आसमाँ को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिये!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !


होशियार ! कह रहा लहू के रंग का निशान !
ऐ किसान! होशियार! होशियार! नौजवान!
होशियार! दुश्‍मनों की दाल अब गले नहीं!
सफेदपोश रहज़नों की चाल अब चले नहीं!
जो इनका सर मरोड़ दे
गु़रूर इनका तोड़ दे
वो सरफ़रोश आरज़ू वही शबाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए ,
ज़बाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए |
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्‍व़ाब क्‍या हुए
तुझे था जिनका इन्‍तज़ार वो जवाब क्‍या हुए
तू उनकी झूठी बात पर कभी न एतबार कर
कि तुझ को साँस साँस का सही हिसाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए ,
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए |
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

-शलभ श्रीराम सिंह

Friday, February 11, 2011

इंक़लाब के बारे में कुछ बातें

नहीं मिलती है
रोटी कभी लंबे समय तक
या छिन जाती है मिलकर भी बार-बार
तो भी आदमी नहीं छोड़ता है
रोटी के बारे में सोचना
और उसे पाने की कोशिश करना.
कभी-कभी लंबे समय तक आदमी नहीं पाता है प्यार
और कभी-कभी तो ज़िन्दगी भर.
खो देता है कई बार वह इसे पाकर भी
फिर भी वह सोचता है तब तक
प्यार के बारे में
जब तक धड़कता रहता है उसका दिल.
ऐसा ही,
ठीक ऐसा ही होता है
इंक़लाब के बारे में भी.
पुरानी नहीं पड़ती है हैं बातें कभी भी
इंक़लाब के बारे में.

-कात्यायनी