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Saturday, December 19, 2015

हबीब जालिब की नज़्म “कॉफ़ी-हाउस”



दिन-भर कॉफ़ी-हाउस में बैठे कुछ दुबले-पतले नक़्क़ाद*
बहस यही करते रहते हैं सुस्त अदब की है रफ़्तार
सिर्फ़ अदब के ग़म में ग़लताँ* चलने फिरने से लाचार
चेहरों से ज़ाहिर होता है जैसे बरसों के बीमार
उर्दू-अदब में ढाई हैं शायर ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ आधा ‘जोश’
या इक-आध किसी का मिस्रा या ‘इक़बाल’ के चंद अशआर
या फिर नज़्म है इक चूहे पर हामिद-‘मदनी’ का शहकार*
कोई नहीं है अच्छा शायर कोई नहीं अफ़्साना-निगार*
‘मंटो’ ‘कृष्ण’ ‘नदीम’ और ‘बेदी’ इन में जान तो है लेकिन
ऐब ये है इन के हाथों में कुंद ज़बाँ की है तलवार
‘आली’ अफ़सर ‘इंशा’ बाबू ‘नासिर’ ‘मीर’ के बर-ख़ुरदार
‘फ़ैज़’ ने जो अब तक लिक्खा है क्या लिक्खा है सब बे-कार
उन को अदब की सेह्हत का ग़म मुझ को उन की सेह्हत का
ये बेचारे दुख के मारे जीने से हैं क्यूँ बे-ज़ार*
हुस्न से वहशत* इश्क़ से नफ़रत अपनी ही सूरत से प्यार
ख़ंदा-ए-गुल पर एक तबस्सुम गिर्या-ए-शबनम* से इंकार
------------------------------------------------------------
*नक़्क़ाद – आलोचक
*ग़लताँ – लोटना
*शहकार – श्रेष्ठ कृति
*अफ़्साना-निगार – कहानीकार
*बे-ज़ार – ऊबे हुए
*वहशत – डर
*ख़ंदा-ए-गुल – फूल की हँसी
*तबस्सुम – मुस्कान
*गिर्या-ए-शबनम – ओस का दु:ख
साभार- https://rekhta.org/

Tuesday, July 7, 2015

अल सल्‍वाडोर के क्रान्तिकारी कवि रोके दाल्‍तोन की कविता - तुम्‍हारी तरह

तुम्हारी तरह 
मैं प्यार करता हूँ प्यार से, 
ज़‍िन्दगी से, 
चीज़ों की मीठी महक से, 
जनवरी के दिनों के नीले नज़ारे से। 

मेरा ख़ून भी ख़ौलता है 
और मैं हँसता हूँ उन आँखों से 
जिन्होंने जाना है आँसुओं का फूट पड़ना 

मुझे यकीन है कि दुनिया ख़ूबसूरत है 
और यह कि रोटी की तरह 
कविता सबकी है।

और यह कि मेरी रग़ें मुझमें नहीं 
बल्क‍ि उन तमाम लोगों के 
एकजुट ख़ून में ख़त्म होती हैं 
जो लड़ते हैं ज़‍िन्दगी के लिए, 
प्यार के लिए, 
चीज़ों के लिए,
नज़ारों और रोटी के लिए,
कविता सबकी।

अनुवाद - आनन्‍द सिंह (अक्षय काळे के मार्गदर्शन में)

Wednesday, April 1, 2015

विजयी लोग - पाब्‍लो नेरूदा की कविता


मैं दिल से इस संघर्ष के साथ हूँ
मेरे लोग जीतेंगे
एक-एक कर सारे लोग जीतेंगे


इन दु:खों को
रूमाल की तरह तब-तक निचोड़ा जाता रहेगा
जब-तक कि सारे आँसू
रेत के गलियारों पर
कब्रों पर
मनुष्‍य की शहादत की सीढ़ियों पर
गिर कर सूख नहीं जाएँ
पर, विजय का क्षण नज़दीक है
इसीलिए घृणा को अपना काम करने दो
ताकि दण्‍ड देने वाले हाथ
काँपें नहीं
समय के हाथ को अपने लक्ष्‍य तक
पहुँचने दो अपनी पूरी गति में
और लोगों को भरने दो ये खाली सड़कें
नये सुनिश्चित आयामों के साथ

यही है मेरी चाहत इस समय के लिए
तुम्‍हें पता चल जायेगा इसका
मेरा कोई और एजेण्‍डा नहीं है

- पाब्‍लो नेरूदा
-अनुवाद - रामकृष्‍ण पाण्‍डेय
(परिकल्‍पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संकलन 'जब मैं जड़ों के बीच रहता हूँ' से साभार)

जीना - नाज़िम हिकमत की कविता

जीना कोई हँसी-मजाक की चीज़ नहीं,
तुम्‍हें इसे संजीदगी से लेना चाहिए।
इतना अधिक और इस हद तक
कि, जैसे मिसाल के तौर पर, जब तुम्‍हारे हाथ बँधे हों
तुम्‍हारी पीठ के पीछे,
और तुम्‍हारी पीठ लगी हो दीवार से
या फिर, प्रयोगशाला में अपना सफेद कोट पहने
और सुरक्षा-चश्‍मा लगाये हुए भी,
तुम लोगों के लिए मर सकते हो --
यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जिनके चेहरे
तुमने कभी देखे न हों,


हालाँकि तुम जानते हो कि जीना ही
सबसे वा‍स्‍तविक, सबसे सुन्‍दर चीज है।
मेरा मतलब है, तुम्‍हें जीने को इतनी
गम्‍भीरता से लेना चाहिए
कि जैसे, मिसाल के तौर पर, सत्‍तर की उम्र में भी
तुम जैतून के पौधे लगाओ -- 
और ऐसा भी नहीं कि अपने बच्‍चों के लिए,
लेकिन इसलिए, हालाँकि तुम मौत से डरते हो
तुम विश्‍वास नहीं करते इस बात का,
इसलिए जीना, मेरा मतलब है, ज्‍यादा कठिन होता है।

- नाज़िम हिकमत

Wednesday, July 23, 2014

मेरे जूते को बचाकर रखना - गाज़ा नरसंहार पर एक मार्मिक कविता

गाज़ा में इज़रायली बमबारी से ढाये जा रहे क़हर की सबसे ह्रदय विदारक तस्‍वीरों में एक बच्‍चे के खून से सने जूते की तस्‍वीर भी थी जो शायद बमबारी में मारा गया था। Musab Iqbal ने इस पर अंग्रेज़ी में एक मार्मिक कविता लिखी थी जिसको हिन्‍दी के पाठकों तक पहुँचाने के लिए मैंने इस कविता का हिन्‍दी अनुवाद किया है:

मेरे जूते को बचाकर रखना
संभालकर रखना इसे कल के लिए
मलबे के बीच दम तोड़ रहे कल के लिए
मेरे जूते को बचाकर रखना
ग़म के संग्रहालय के लिए
उस संग्रहालय के लिए मैं दे रहा हूं अपने जूते को,
खू़न से सने जूते को
और हताशा में डूबे मेरे शब्‍दों को
और उम्‍मीद से लबरेज़ मेरे आंसुओं को
और सन्‍नाटे में डूबे मेरे दर्द को
समुद्र के किनारे से मेरे फुटबाल को भी उठा लेना,
या शायद उसके कुछ हिस्‍सों को जिन पर खून के धब्‍बे नहीं
एक महाशक्ति की कायरता के दस्‍तख़त हैं
मेरी स्‍मृति उस बम की खोल में सीलबन्‍द है
शोक की प्रतिध्‍वनि में, विदाई के चुंबन में
ज़ि‍न्‍द‍गी का हर रंग ज़हरीला है
और जानलेवा रसायनों के बादल हर ख्‍़वाब का दम घोट रहे हैं
वे तस्‍वीरें जो तुम्‍हें रात में परेशान करती हैं
और दिन में जब तुम हमारे बारे में पढ़ते हो (आराम फ़रमाते हुए)
वे तस्‍वीरें हमें परेशान नहीं करती हैं
अगर कोई चीज़ परेशान करती है तो वह है
तुम्‍हारी ख़ामोशी, तुम्‍हारी शिथि‍लता
तुम्‍हारी विचारवान निगाहें, तुम्‍हारा गुनहगार इंतज़ार
यहाँ आक्रोश एक सद्गुण है,
हमारा धैर्य हमारे प्रतिरोध में दर्ज़ है!

  
अनुवाद - अानन्‍द सिंह
अंग्रेज़ी की मूल कविता यहां प‍ढी़ जा सकती है। 

Saturday, June 21, 2014

मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' का एक अंश

सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं
उनके ख़याल से यह सब गप है
मात्र किंवदन्ती।
रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग
नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।
प्रश्न की उथली-सी पहचान
राह से अनजान
वाक् रुदन्ती।
चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,...

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये
समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।
गढ़े जाते संवाद,
गढ़ी जाती समीक्षा,
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूर।
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
किराये के विचारों का उद्भास।
बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं।
नपुंसक श्रद्धा
सड़क के नीचे की गटर में छिप गयी...

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार
द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,
एक स्पिलट सेकेण्ड में शत साक्षात्कार।
टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।
रक्त में बहती हैं शान की किरनें
विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गयी...


Tuesday, June 17, 2014

जो बोलते हो उसे सुनो भी - बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट

अध्‍यापक, अक्‍सर मत कहो कि तुम सही हो
छात्रों को उसे महसूस कर लेने दो खुद-ब-ख्‍ाुद
सच को थोपो मत:
यह ठीक नहीं है सच के हक़ में
बोलते हो जो उसे सुनो भी।
- ('परिकल्‍पना' द्वारा प्रकाशित 'बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट: इकहत्‍तर कविताएं और तीस छोटी कहानियां' से)

Monday, June 9, 2014

हबीब जालिब की कविता - जु़ल्‍मत को जिया



हबीब जालिब ने यह कविता जिया कालीन पाकिस्‍तान के सन्‍दर्भ में लिखी थी।
मोदी कालीन भारत के बारे में भी यह कविता सटीक बैठती है।

हक़ बात पे कोड़े और ज़‍िन्‍दां
बातिल के शिकंजे में है ये जां
इन्‍सां हैं कि सहमे बैठे हैं
खूँखार दरिंदे हैं रक्‍सां 
इस जु़ल्‍मो-सितम को लुफ़्त-ओ-करम
इस दुख को दवा क्‍या लिखना 
जु़ल्‍मत को जिया, सर सर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना, क्‍या लिखना
हर शाम यहां शाम-ए-वीरां आसेब ज़दा रस्‍ते गलियां 
जिस शहर की धुन में निकले थे
वो शहर दिल-ए-बरबाद कहां
सेहरा को चमन
बन को गुलशन
बादल को रिदा क्‍या लिखना
जु़ल्‍मत को जिया, सरसर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना

एे मेरे वतन के फ़नकारों
ज़ुल्‍मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल सराओं के वासी
क़ातिल हैं सभी अपने यारों
विरसे में हमें ये ग़म है मिला
इस ग़म को नया क्‍या लिखना
जु़ल्‍मत को जिया, सरसर को सबा
बन्‍दे को खुदा क्‍या लिखना





Speak the truth and you will be flogged and imprisoned
This life is caught in the grip of lies,
Human beings are cowering  in terror,
While blood thirsty monsters are on the rampage.
How can this cruelty be called kindness,
How can I write this disease as a cure?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.


Every evening  here is  one of desolation
Every road and alley is struck by calamity,
With hope in our hearts we searched for a city,
Where is that city now, my devastated heart?
How can this desert be called as a rose garden,
This cloud as a silver lining?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.



Oh fellow artists of my homeland!
Don’t sacrifice your art to this darkness,
These people who live in palaces,
 All are murderers, my comrades.           
We have inherited this grief from the past,
How can I write of this grief as a new one ?
This dark night as dawn , these hot desert wind as a morning breeze  And a human as god I cannot write.

Saturday, July 20, 2013

ये किसका लहू है कौन मरा…

ऐ रहबरे-मुल्को-कौम बता
आँखें तो उठा नज़रें तो मिला
कुछ हम भी सुने हमको भी बता
ये किसका लहू है कौन मरा…

धरती की सुलगती छाती पर
बेचैन शरारे पूछते हैं
हम लोग जिन्हें अपना न सके
वे खून के धारे पूछते हैं
सड़कों की जुबां चिल्लाती है
सागर के किनारे पूछते है|
ये किसका लहू है कौन मरा…

ऐ अज़्मे-फना देने वालो
पैगामे-वफ़ा देने वालो
अब आग से क्यूँ कतराते हो
मौजों को हवा देने वालो
तूफ़ान से अब क्यूँ डरते हो
शोलों को हवा देने वालो
क्या भूल गए अपना नारा
ये किसका लहू है कौन मरा

हम ठान चुके हैं अब जी में
हर जालिम से टकरायेंगे
तुम समझौते की आस रखो
हम आगे बढ़ते जायेंगे
हम मंजिले-आज़ादी की कसम
हर मंजिल पे दोहराएँगे
ये किसका लहू है कौन मरा…

–साहिर लुधियानवी
(1946 के नौसेना विद्रोह के समय लिखी नज़्म)

Thursday, August 16, 2012

देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

भगतसिंह इस बार ना लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे
बम्ब-सम्ब को छोडो भाषण दिया तो पकड़े जाओगे
निकला है कानून नया चुटकी बजते बंध जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो सीधे मुक्ति पाओगे
कांग्रेस का हुक्म, जरूरत क्या वारंट तलाशी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की! 

मत समझो पूजे जाओगे
क्योंकि लड़े थे दुश्मन से रुत ऐसी है
अब दिल्ली की आँख लड़ी है लन्दन से,
कामनवेल्थ कुटुंब देश को खीँच रहा है मंतर से
प्रेम विभोर हुए नेतागण , रस बरसा है अम्बर से
योगी हुए वियोगी दुनिया बदल गयी बनवासी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

गढ़वाली जिसने अंग्रेजी शासन में विद्रोह किया
वीर क्रांति के दूत, जिन्होंने नहीं जान का मोह किया
अब भी जेलों में सड़ते हैं न्यू माडल आजादी है
बैठ गए हैं काले, पर गोरे जुल्मों की गादी है
वही रीत है वही नाट है, गोरे सत्यानासी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

सत्य अहिंसा का शासन है रामराज्य फिर आया है
भेड़-भेडिये एक घाट हैं, सब इश्वर की माया है
दुश्मन हे जज अपना, टीपू जैसों का क्या करना है
शांति सुरक्षा की खातिर हर हिम्मतवर से डरना है
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झांसी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की!

                                                          -शंकर शैलेन्द्र

Sunday, August 12, 2012

कचोटती स्वतन्त्रता – तुर्की के महान कवि नाज़िम हिकमत की कविता

तुम खर्च करते हो अपनी आँखों का शऊर,
अपने हाथों की जगमगाती मेहनत,
और गूँधते हो आटा दर्जनों रोटियों के लिए काफी
मगर ख़ुद एक भी कौर नहीं चख पाते;
तुम स्वतंत्र हो दूसरों के वास्ते खटने के लिए
अमीरों को और अमीर बनाने के लिए
तुम स्वतंत्र हो।

जन्म लेते ही तुम्हारे चारों ओर
वे गाड़ देते हैं झूठ कातने वाली तकलियाँ
जो जीवनभर के लिए लपेट देती हैं
तुम्हें झूठों के जाल में।
अपनी महान स्वतंत्रता के साथ
सिर पर हाथ धरे सोचते हो तुम
ज़मीर की आज़ादी के लिए तुम स्वतंत्र हो।

तुम्हारा सिर झुका हुआ मानो आधा कटा हो
गर्दन से,
लुंज-पुंज लटकती हैं बाँहें,
यहाँ-वहाँ भटकते हो तुम
अपनी महान स्वतंत्रता में:
बेरोज़गार रहने की आज़ादी के साथ
तुम स्वतंत्र हो।

तुम प्यार करते हो देश को
सबसे करीबी, सबसे क़ीमती चीज़ के समान।
लेकिन एक दिन, वे उसे बेच देंगे,
उदाहरण के लिए अमेरिका को
साथ में तुम्हें भी, तुम्हारी महान आज़ादी समेत
सैनिक अड्डा बन जाने के लिए तुम स्वतंत्र हो।
तुम दावा कर सकते हो कि तुम नहीं हो
महज़ एक औज़ार, एक संख्या या एक कड़ी
बल्कि एक जीता-जागता इंसान
वे फौरन हथकड़ियाँ जड़ देंगे
तुम्हारी कलाइयों पर।
गिरफ्तार होने, जेल जाने
या फिर फाँसी चढ़ जाने के लिए
तुम स्वतंत्र हो।

नहीं है तुम्हारे जीवन में लोहे, काठ
या टाट का भी परदा;
स्वतंत्रता का वरण करने की कोई ज़रूरत नहीं :
तुम तो हो ही स्वतंत्र।
मगर तारों की छाँह के नीचे
इस किस्‍म की स्वतंत्रता कचोटती है।

Thursday, May 3, 2012

नफ़स नफ़स, कदम कदम

नफ़स नफ़स, कदम कदम
बस एक फ़िक्र दम-बदम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !

जहाँ अवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हो जान से
जहाँ पे लफ़्ज-ए-अम्‍न एक खौफ़नाक राज़ हो
जहाँ कबूतरों का सर परस्त एक बाज़ हो
वहाँ ना चुप रहेंगे हम
कहेंगे, हाँ कहेंगे हम
हमारा हक़, हमारा हक़ हमें जनाब! चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए !
ज़बाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

यकीन आँख मूँदकर किया था जिन पे जान कर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तानकर
उन्‍हीं की सरहदों में कै़द हैं हमारी बोलियाँ
वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियाँ।
जो इनका भेद खोल दे
हर एक बात बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिये !
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बे-वतन
उन्‍हीं की आह बे-असर उन्‍हीं की लाश बे-कफ़न
लहू पसीना बेच कर जो पेट तक न भर सकें
करें तो क्‍या करें भला, न जी सकें न मर सकें
सियाह ज़िन्‍दगी के नाम
जिनकी हर सुबह ओ शाम
उनके आसमाँ को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिये!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए !
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए !
इन्क़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इन्क़लाब !


होशियार ! कह रहा लहू के रंग का निशान !
ऐ किसान! होशियार! होशियार! नौजवान!
होशियार! दुश्‍मनों की दाल अब गले नहीं!
सफेदपोश रहज़नों की चाल अब चले नहीं!
जो इनका सर मरोड़ दे
गु़रूर इनका तोड़ दे
वो सरफ़रोश आरज़ू वही शबाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें ज़बाब चाहिए ,
ज़बाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए |
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गए वो वायदे सुखों के ख्‍व़ाब क्‍या हुए
तुझे था जिनका इन्‍तज़ार वो जवाब क्‍या हुए
तू उनकी झूठी बात पर कभी न एतबार कर
कि तुझ को साँस साँस का सही हिसाब चाहिए
घिरे हैं हम सवाल से हमें जबाब चाहिए ,
जबाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए |
इंक़लाब ! जिंदाबाद !
जिंदाबाद ! इंक़लाब !

-शलभ श्रीराम सिंह

Friday, February 3, 2012

लड़ाई जारी है...

जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।
यह जो छापा तिलक लगाए और जनेऊधारी है
यह जो जात पॉत पूजक है यह जो भ्रष्टाचारी है
यह जो भूपति कहलाता है जिसकी साहूकारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी  तैयारी है।

यह जो तिलक मांगता है, लडके की धौंस जमाता है
कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नरक बनाता है
पैसे के बल पर यह जो अनमेल ब्याह रचाता है
यह जो अन्यायी है सब कुछ ताकत से हथियाता है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।

यह जो काला धन फैला है, यह जो चोरबाजारी है
सत्ता पाँव चूमती जिसके यह जो सरमाएदारी है
यह जो यम-सा नेता है, मतदाता की लाचारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।
जारी है-जारी है
अभी लड़ाई जारी है।

-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

Wednesday, November 2, 2011

धीमी मौत


जो बन जाते हैं आदत के ग़ुलाम,
चलते रहते हैं रोज़ उन्‍हीं राहों पर,
बदलती नहीं जिनकी कभी रफ़्तार,
जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते,
और बातें नहीं करते अनजान लोगों से,
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो रहते हैं दूर आवेगों से,
भाती है जिन्‍हें सियाही उजाले से ज़्यादा,
जिनका 'मैं' बेदखल कर देता है उन भावनाओं को,
जो चमक भरती हैं तुम्‍हारी आँखों में,
उबासियों को मुस्कान में बदल देती हैं,
ग़लतियों और दु:खों से उबारती हैं हृदय को,
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो उलट-पुलट नहीं देते सबकुछ
जब काम हो जाए बोझिल और उबाऊ,
किसी सपने के पीछे भागने की ख़ातिर
चल नहीं पड़ते अनजान राहों पर,
जो ज़ि‍न्‍दगी में कभी एक बार भी,
समझदारी भरी सलाह से बचकर भागते नहीं,

वे मरते हैं धीमी मौत।
जो निकलते नहीं यात्राओं पर,
जो पढ़ते नहीं,
नहीं सुनते संगीत,
ढूँढ़ नहीं पाते अपने भीतर की लय,
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो ख़त्‍म कर डालते हैं ख़ुद अपने प्रेम को,
थामते नहीं मदद के लिए बढ़े हाथ,
जिनके दिन बीतते हैं
अपनी बदकिस्‍मती या
कभी न रुकने वाली बारिश की शिकायतों में
वे मरते हैं धीमी मौत।

जो कोई परियोजना शुरू करने से पहले ही छोड़ जाते हैं,
अपरिचित विषयों के बारे में पूछते नहीं सवाल,
और चुप रहते हैं उन चीज़ों के बारे में पूछने पर
जिन्‍हें वे जानते हैं,
वे मरते हैं धीमी मौत।

किश्‍तों में मरते चले जाने से बचना है
तो याद रखना होगा हमेशा
कि ज़ि‍न्‍दा रहने के लिए काफ़ी नहीं बस साँस लेते रहना,
कि एक प्रज्‍ज्वल धैर्य ही ले जाएगा हमें
एक जाज्‍वल्‍यमान सुख की ओर।

-- पाब्‍लो नेरूदा

Friday, October 21, 2011

आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख़्‍वाब हैं

दुनिया के हर सवाल के हम ही जवाब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख़्‍वाब हैं।
इन बाजुओं ने साथी ये दुनिया बनायी है
काटा है जंगलों को,बस्‍ती बसाई है
जांगर खटा के खेतों में फसलें उगाई हैं
सड़कें निकाली हैं अटारी उठाई है
ये बांध बनाये हैं फ़ैक्‍टरी बनाई है
हम बेमिसाल हैं हम लाजवाब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख़्‍वाब हैं।
अब फिर नया संसार बनाना है हमें ही
नामों-निशां सितम का मिटाना है हमें ही
अब आग में से फूल खिलाना है हमें ही
फिर से अमन का गीत सुनाना है हमें ही
हम आने वाले कल के आफताबे-इन्‍क़लाब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख्‍़वाब हैं।
हक़ के लिये अब जंग छेड़ दो दोस्‍तो
जंग बन के फूल उगेगा दोस्‍तो
बच्‍चों की हंसी को ये खिलायेगा दोस्‍तो
प्‍यारे वतन को स्‍वर्ग बनायेगा दोस्‍तो
हम आने वाले कल की इक खुली किताब हैं
आंखों में हमारी नयी दुनिया के ख्‍़वाब हैं।

-शशि प्रकाश

Wednesday, August 31, 2011

Which side are you on? :: by Pete Seeger

Which side are you on boys?
Which side are you on?
Which side are you on boys?
Which side are you on?

They say in Harlan County
There are no neutrals there.
You'll either be a union man
Or a thug for J. H. Blair.

Which side are you on boys?
Which side are you on?
Which side are you on boys?
Which side are you on?

My dady was a miner,
And I'm a miner's son,
He'll be with you fellow workers
Until this battle's won.

Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?

Oh workers can you stand it?
Oh tell me how you can?
Will you be a lousy scab
Or will you be a man?

Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?

Come all you good workers,
Good news to you I'll tell
Of how the good old union
Has come in here to dwell.

Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?
Which side are you on?

Tuesday, August 30, 2011

शहीदों के लिए

ज़ि‍न्‍दगी लड़ती रहेगी, गाती रहेगी
नदियाँ बहती रहेंगी
कारवाँ चलता रहेगा, चलता रहेगा, बढ़ता रहेगा
मुक्ति की राह पर
छोड़कर साथियो, तुमको धरती की गोद में।

खो गये तुम हवा बनकर वतन की हर साँस में
बिक चुकी इन वादियों में गन्‍ध बनकर घुल गये
भूख से लड़ते हुए बच्‍चों की घायल आस में
कर्ज़ में डूबी हुई फसलों की रंगत बन गये

ख्‍़वाबों के साथ तेरे चलता रहेगा...

हो गये कुर्बान जिस मिट्टी की खातिर साथियो
सो रहो अब आज उस ममतामयी की गोद में
मुक्ति के दिन तक फ़िज़ाँ में खो चुकेंगे नाम तेरे
देश के हर नाम में ज़ि‍न्‍दा रहोगे साथियो

यादों के साथ तेरे चलता रहेगा...

जब कभी भी लौट कर इन राहों से गुज़रेंगे हम
जीत के सब गीत कई-कई बार हम फिर गायेंगे
खोज कैसे पायेंगे मिट्टी तुम्‍हारी साथियो
ज़र्रे-ज़र्रे को तुम्‍हारी ही समाधि पायेंगे

लेकर ये अरमाँ दिल में चलता रहेगा...


Thursday, June 16, 2011

बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूँजीपतिया...


बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूँजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए
अपने महलिया में करे उजियरवा
कि बिजरी के रडवा जराए-जराए

कत्तो बने भिटवा कतहुँ बने गढ़ई
कत्तो बने महल कतहुँ बने मड़ई
मटिया के दियना तूहीं त बुझवाया
कि सोनवा के बेनवा डोलाए-डोलाए

मिलया में खून जरे खेत में पसीनवा
तबहुं न मिलिहैं पेट भर दनवा
अपनी गोदमिया तूहीं त भरवाया
कि बड़े-बड़े बोरवा सियाए-सिआए

राम अउर रहीम के ताके पे धइके लाला
खोई के ईमनवा बटोरे धन काला
देसवा के हमरे तू लूट के खाय
कई गुना दमवा बढ़ाए-बढ़ाए

जे त करे काम, छोट कहलावे
ऊ बा बड़ मन जे जतन बतावे
दस के सासनवा नब्बे पे करवावे
इहे परिपटिया चलाए-चलाए

जुड़ होई छतिया तनिक दऊ बरसा
अब त महलिया में खुलिहैं मदरसा
दुखिया के लरिका पढ़े बदे जइहैं
छोट-बड़ टोलिया बनाए-बनाए

बिनु काटे भिंटवा गड़हिया न पटिहैं
अपने खुसी से धन-धरती न बटिहैं
जनता केतलवा तिजोरिया पे लगिहैं
कि महल में बजना बजाए-बजाए

बड़ी-बड़ी कोठिया सजाए पूँजीपतिया
कि दुखिया के रोटिया चोराए-चोराए।

                                       - जमुई  खाँ आज़ाद 

Thursday, April 28, 2011

हम वो इंक़लाब हैं!!!


रुके न जो, झुके न जो, दबे न जो,मिटे न जो
हम वो इंक़लाब हैं,ज़ुल्म का जवाब हैं
हर शहीद का,गरीब का हमीं तो ख़्वाब हैं।

तख़्त और ताज को, कल के लिए आज को
जिसमें ऊंच-नीच है ऐसे हर समाज को
हम बदल के ही रहेंगे वक़्त के मिजाज़ को

क्रांति कि मांग है, जंगलों में आग है
दासता की बेड़ियों को तोड़ते बढ़ जायेंगे .
लड़ रहे हैं इसलिए की प्यार जग में जी सके
आदमी का खून कोई आदमी न पी सके

मालिकों- मजूर के,
नौकरों हुजूर के
भेद हम मिटायेंगे, समानता को लायेंगे.

जानते नहीं हैं फ़र्क हिन्दू-मुसलमान का
मानते हैं रिश्ता इंसान से इंसान का
धर्म के देश के, भाषा के भेष के
फ़र्क को मिटायेंगे, समानता को लायेंगे

हुक्म चल सकेगा नहीं ज़ुल्मी हुक्मरान का
सारे जग पे हक हमारा, हम पे इस जहाँ का
गरीब को जगायेंगे, गरीबी को मिटायेंगे
एकता के जोर पे हर ज़ुल्म से लड़ जायेंगे.

रुके न जो, झुके न जो, दबे न जो, मिटे न जो
हम वो इंक़लाब हैं,ज़ुल्म का जवाब हैं
हर शहीद का,गरीब का हमीं तो ख़्वाब हैं।

--छात्र युवा संघर्ष वाहिनी

Sunday, April 10, 2011

शिखरों तक जाने के लिए

कौवाउड़ान दूरियाँ तय करके
संभव नहीं
इन शिखरों तक  पहुँच पाना.
इन तक पहुँचने की
दुर्गम, कठिन, सर्पिल
चढाव-उतार भरी
राहों को जानना होगा.
यात्राओं के लम्बे अनुभव
होने चाहिए-
सफल और असफल दोनों ही,
एकदम ज़िन्दगी की तरह 
चाहे वह आदमी की हो
या फिर किसी कौम की. 

--शशि प्रकाश

Monday, March 21, 2011

फ़ैज़ की नज़्म - सिपाही का मर्सिया

उट्ठो अब माटी से उट्ठो
जागो मेरे लाल 
अब जागो मेरे लाल 
तुम्हरी सेज सजावन कारन
देखो आई रैन अँधियारन
नीले शाल-दोशाले ले कर
जिन में इन दुखियन अँखियन ने
ढ़ेर किये हैं इतने मोती
इतने मोती जिनकी ज्योती 
दान से तुम्हरा, जगमग  लागा 
नाम चमकने. 
उट्ठो अब माटी से उट्ठो
जागो मेरे लाल 
अब जागो मेरे लाल  
घर-घर बिखरा भोर का कुन्दन 
घोर अँधेरा अपना आँगन
जाने कब से राह तके हैं
बाली दुल्हनिया बाँके वीरन
सूना तुम्हरा राज पड़ा है
देखो कितना काज पड़ा है
बैरी बिराजे राज सिंहासन
तुम माटी में लाल
उठो अब माटी से उठो,जागो मेरे लाल
हाथ  न करो माटी से उठो,जागो मेरे लाल
जागो मेरे लाल

Monday, March 14, 2011

पाश की कविता - हम लड़ेंगे साथी


हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिये
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिये
हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर 
हल अब भी चलता हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कंधों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
कत्ल हुए ज़ज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नज़रों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी.....
....
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रुरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए

उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे

Friday, February 11, 2011

इंक़लाब के बारे में कुछ बातें

नहीं मिलती है
रोटी कभी लंबे समय तक
या छिन जाती है मिलकर भी बार-बार
तो भी आदमी नहीं छोड़ता है
रोटी के बारे में सोचना
और उसे पाने की कोशिश करना.
कभी-कभी लंबे समय तक आदमी नहीं पाता है प्यार
और कभी-कभी तो ज़िन्दगी भर.
खो देता है कई बार वह इसे पाकर भी
फिर भी वह सोचता है तब तक
प्यार के बारे में
जब तक धड़कता रहता है उसका दिल.
ऐसा ही,
ठीक ऐसा ही होता है
इंक़लाब के बारे में भी.
पुरानी नहीं पड़ती है हैं बातें कभी भी
इंक़लाब के बारे में.

-कात्यायनी 

Thursday, February 3, 2011

ज़िन्दगी और मौत



मौत का न होना ही ज़िन्दगी नहीं,
और ज़िन्दगी का न होना ही मौत नहीं,
जीते जी इंसान मर सकता है.
और मरते हुए भी इंसान ज़िन्दा रह सकता है.



अंधेरे में रहते हुए भी उजाले की उम्मीद में सार्थक प्रयास ज़िन्दगी की निशानी है,
उजाले में रहते हुए अंधेरे की नज़रंदाज़ी मौत की निशानी है.

वर्तमान उदासी के बावजूद भविष्य के प्रति उल्लास ज़िन्दगी की निशानी है,
ज़िन्दगी की उमंगों के बीच सामाजिक उदासी से विरक्ति मौत की निशानी है.

ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जंग में सरफ़रोशी की तमन्ना ज़िन्दगी की निशानी है,
शोषकों से समझौता कर उनके सामने घुटने टेकना मौत की निशानी है

इंसानी अच्छाइयों से असीम प्यार और बुराइयों से बेइन्तेहाँ नफ़रत ज़िन्दगी की निशानी है,
अन्याय और उत्पीड़न को देखते हुए भी अनदेखा करना मौत की निशानी है.

तात्कालिक हार के बाद भी निर्णायक जंग जीतने का इरादा ज़िन्दगी की निशानी है,
भारी जीत के नशे में पैदा अहमन्यता मौत की निशानी है.

ज़मीन पर रहते हुए भी आसमान को छू लेने की ख्वाहिश ज़िन्दगी की निशानी है,
आकाश में उड़ने के बाद ज़मीन से कट जाना मौत की निशानी है.

श्रम करते हुए ज़िन्दगी जीने का तमन्ना ज़िन्दगी की निशानी है,
और ज़िन्दगी जीने की प्रक्रिया में श्रम से अलगाव मौत की निशानी है.

मरते दम तक ज़िन्दगी का एक-एक लम्हा जीने की चाहत ज़िन्दगी की निशानी है,
ज़िन्दा रहते हुए भी मौत की घड़ी का इंतज़ार मौत की निशानी है.

ज़िन्दगी और मौत में लगातार द्वन्द चलता रहता है
शायद इसीलिये इंसान रोज़-रोज़ जीता है और रोज़-रोज़ मरता है,
कभी ज़िन्दगी का पहलू प्रधान होता है तो कभी मौत का.

Tuesday, January 25, 2011

गणतंत्र की परिभाषा

बचपन की धुंधली  यादों में
अभी तक महफूज़ है एक धुंधली सी परिभाषा
गणतंत्र यानी एक ऐसी व्यवस्था
जहाँ सर्वोपरि होती है जनता
जहाँ सारे फ़ैसले लेती है जनता
और उनको लागू भी करती है जनता

बचपन की दहलीज़ लांघते ही
दुनियादार लोगों ने बताई एक नयी परिभाषा
चूँकि जनता है अभी तक नादान
नहीं आता उसको राजकाज चलाने का काम
इसलिये फ़ैसले लेते हैं
जनता के नुमाइंदे
जनता के नाम
और वो उनको लागू करते हैं
जनता के नाम

वक़्त बीतने के साथ उजागर हुई
इस व्यवस्था की हकीक़त
और पाया कि यहाँ जनता के नाम पर
फ़ैसले लेते हैं जनता के लुटेरे
और उनको लागू करते हैं जनता के ख़िलाफ़

गणतंत्र के मखमली परदे के पीछे छिपी है
लूटतंत्र की घिनौनी सच्चाई
धनतंत्र की नंगई और शोषणतंत्र की हैवानगी
राजपथ की परेड के शोरगुल के पीछे दबी हैं
भूख और कुपोषण के शिकार बच्चों की चीखें
रंगबिरंगी  झाँकियों के पीछे गुम हैं
महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता की आहें

लेकिन मैंने यह भी जाना कि
गणतंत्र की उस धुंधली परिभाषा के पीछे था
जनता के संघर्षों और कुर्बानियों का एक लंबा इतिहास
और उसको अमली जामा पहनाने के लिये भी चाहिये
संघर्षों और कुर्बानियों का एक नया सिलसिला       

Saturday, January 22, 2011

(चूहा)दौड़...

दौड़
दौड़ से बाहर रहकर ही
सोचा जा सकता है
दौड़ के आलावा और कुछ
जब तक दौड़ में हो
दौड़ ही ध्येय
दौड़ ही चिन्ता
दौड़ ही मृत्यु
होने को प्रेम भी है यहाँ कविता भी
और उनका सौंदर्य भी
मगर बोध कम भोग ज़्यादा
दौड़ में दौड़ती रसिकता
सब दौड़ से दौड़ तक
सब कुछ दौड़मयी
दौड़ में दौड़ ही होते हैं
दौड़ के पड़ाव
दौड़ में रहते हुए कुछ और नहीं सोचा जा सकता
दौड़ के आलावा
यहाँ तक की ढंग से दौड़ के बारे में भी!

--शिवराम

Wednesday, January 19, 2011

हमारे समय में प्रासंगिक मुक्तिबोध की कविता

"मिथ्याचारों-भ्रष्टाचारों की मध्य रात्रि
में सभी ओर
काले-काले वीरान छोर.
ख़ुदगर्ज़ी की बदसूरत स्याह दरख्तों की
गठियल डालों पर रहे झूल
फाँसी के फंदों में मानव-आदर्श-प्रेत!!
जैसे सूखे जंगली बबूल
वैसे निहेतुक जीवन की शुष्क कविता.
सत्ताधारी की पैशाचिक हड्डी के पंजे की सत्ता
जीवन-हत्यारों की काली यह रोमहर्षमय  देश-कथा
अब क्षितिज-क्षितिज पर गूँज रहा
चीखता हुआ-सा एक शोर
शोषण के तलघर में अत्याचारों की चाबुक मार घोर."

('मालव निर्झर की झर-झर कंचन रेखा' : मुक्तिबोध )

Sunday, January 16, 2011

हमारे समय का इतिहास...

मेरे दोस्तो,
हमारे समय का इतिहास
बस यही न रह जाये
कि हम  धीरे-धीरे मरने को ही
जीना समझ बैठें
कि हमारा समय
घड़ी के साथ नहीं
हड्डियों के गलने-खपने से नापा जाए...

- पाश

Thursday, December 16, 2010

Pablo Neruda's poem : The Standard Oil Company


This poem(originally in Spanish, "La Standard Oil Co") was written by Pablo Neruda who is known as the poet of 'enslaved humanity' in 1940 as part of a collection Canto General. The poem describes sarcastically the plunder of the natural resources of Latin America by the American firms. Even after 70 years since it was written, it is so relevant in today's world.


When the drill bored down
toward the stony fissures
and plunged its implacable intestine
into the subterranean estates,
and dead years, eyes
of the ages, imprisoned
plants’ roots
and scaly systems
became strata of water,
fire shot up through the tubes
transformed into cold liquid,
in the customs house of the heights,
issuing from its world of sinister depth,
it encountered a pale engineer
and a title deed.

However entangled the petroleum’s
arteries may be, however the layers
may change their silent site
and move their sovereignty
amid the earth’s bowels,
when the fountain gushes
its paraffin foliage,
Standard Oil arrived beforehand
with its checks and its guns,
with its governments and its prisoners.

Their obese emperors
from New York are suave
smiling assassins
who buy silk, nylon, cigars,
petty tyrants and dictators.

They buy countries, people, seas,
police, county councils,
distant regions where
the poor hoard their corn
like misers their gold:
Standard Oil awakens them,
clothes them in uniforms, designates
which brother is the enemy.
The Paraguayan fights its war,
And the Bolivian wastes away
in the jungle with its machine gun.

A President assassinated
for a drop of petroleum,
a million-acre
mortgage, a swift
execution on a morning
mortal with light, petrified,
a new prison camp for
subversives, in Patagonia,
a betrayal, scattered shots
beneath a petroliferous moon,
a subtle change of ministers
in the capital, a whisper
like an oil tide,
and zap, you’ll see
how Standard Oil’s letters
shine above the clouds,
above the seas, in your home,
illuminating their dominions.

Sunday, December 5, 2010

फ़ैज़ की नज़्म: हम देखेंगे


पाकिस्तान की मशहूर गायिका इक़बाल बानो ने १९८५ में ज़िया-उल-हक़ की सैनिक तानाशाही द्वारा फैज़ की नज़्मों पर लगाये गए प्रतिबन्ध के बावजूद बहुचर्चित नज़्म 'हम देखेंगे' गाया जिसको सुनने के लिए लगभग ५०,००० लोग इकठ्ठा हुए. 

हम देखेंगे
लाज़िम है के हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौहे-अज़ल पे लिखा है

जब ज़ुल्मों-सितम के कोहे-गरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़े-खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहले-सफा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब भी है, हाज़िर भी
जो मंज़र भी है, नाज़िर भी
उठ्ठेगा अनलहक़(*) का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज़ करेगी खल्क़े-खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो .



We shall Witness
It is certain that we too, shall witness
the day that has been promised
of which has been written on the slate of eternity

When the enormous mountains of tyranny
will blow away like cotton.
Under our feet- the feet of the oppressed-
when the earth will pulsate deafeningly
and on the heads of our rulers
when lightning will strike.

From the abode of God
When icons of falsehood will be taken out,
When we, the righteous ones, the heretics
will be seated on high cushions
When the crowns will be tossed,
When the thrones will be brought down.

Only The name will survive
Who is invisible but is also present
Who is both the spectacle and the beholder
'I am the Truth'- the cry will rise,
Which is I, as well as you
And then God’s creation(people) will rule
Which is I, as well as you

अनलहक़ - 'मैं सत्य हूँ' , 'मैं ईश्वर हूँ'; ऐसा कहने पर इरानी सूफ़ी संत मंसूर को सरे आम सज़ा-ए-मौत दी गयी थी.

Thursday, November 25, 2010

Solidarity Song by Bertolt Brecht

Peoples of the world, together
Join to serve the common cause!
So it feeds us all for ever
See to it that it's now yours.

Forward, without forgetting
Where our strength can be seen now to be!
When starving or when eating
Forward, not forgetting
Our solidarity!

Black or white or brown or yellow
Leave your old disputes behind.
Once start talking with your fellow
Men, you'll soon be of one mind.

Forward, without forgetting
Where our strength can be seen now to be!
When starving or when eating
Forward, not forgetting
Our solidarity!

If we want to make this certain
We'll need you and your support.
It's yourselves you'll be deserting
if you rat your own sort.

Forward, without forgetting
Where our strength can be seen now to be!
When starving or when eating
Forward, not forgetting
Our solidarity!

All the gang of those who rule us
Hope our quarrels never stop
Helping them to split and fool us
So they can remain on top.

Forward, without forgetting
Where our strength can be seen now to be!
When starving or when eating
Forward, not forgetting
Our solidarity!

Workers of the world, uniting
Thats the way to lose your chains.
Mighty regiments now are fighting
That no tyrrany remains!

Forward, without forgetting
Till the concrete question is hurled
When starving or when eating:
Whose tomorrow is tomorrow?
And whose world is the world? 

Thursday, November 18, 2010

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता - सभी अफ़सर उनके ...


वो सब कुछ करने को तैयार
सभी अफसर उनके
जेल और सुधार-घर उनके
सभी दफ़्तर उनके
                        कानूनी किताबें उनकी
                        कारखाने हथियारों के
                        पादरी प्रोफ़ेसर उनके
                        जज और जेलर तक उनके
                       सभी अफसर उनके
अखबार, छापेखाने
हमें अपना बनाने के
बहाने चुप कराने के
नेता और गुण्डे तक उनके
                       एक दिन ऐसा आयेगा
                       पैसा फिर काम न आएगा
                       धरा हथियार रह जायेगा
                       और ये जल्दी ही होगा
                       ये ढाँचा बदल जायेगा
                               ये ढाँचा बदल जायेगा
                                           ये ढाँचा बदल जायेगा
  • बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ('मदर' नाटक से)

Sunday, October 17, 2010

तस्वीर बदल दो दुनिया की!!!

तोड़ो ये दीवारें, भर दो अब ये गहरी खाई
जागो दुखियारे इन्सानो
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की

चलती मशीनें ये तेरे ही हाथों से
उगती हैं फसलें ये तेरे ही हाथों से
क्यों फिर ले जाते हैं
ज़ुल्मी जोंक तुम्हारी कमाई
उठ जाओ मज़दूरो और किसानो
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की

ये चौबारे महल उठाये हैं तूने
सुख के सब सामान जुटाये हैं तूने
फिर क्यों बच्चों ने तेरे
हर दम आधी रोटी खायी
उठ जाओ मज़लूमो और जवानो
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की

ज़ुल्मों की कब्रें तेरे ही हाथ खुदेंगी
तेरे ही हाथों नयी दुनिया बनेगी
मत ये समझो तूने 
जीवन की सब पूँजी गँवायी
जागो दुखियारे इन्सानो
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की
         तस्वीर बदल दो दुनिया की

 - शशि प्रकाश

Saturday, October 16, 2010

ज़िन्दगी ने एक दिन कहा कि तुम लड़ो!!!

ज़िन्दगी ने एक दिन कहा कि तुम लड़ो,
तुम लड़ो, तुम लड़ो
तुम लड़ो कि चहचहा उठें हवा के परिन्‍दे
तुम लड़ो कि आसमान चूम ले ज़मीन को
तुम लड़ो कि ज़िन्दगी महक उठे
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़िन्दगी ने एक दिन कहा कि तुम उठो,
तुम उठो, तुम उठो
तुम उठो, उठो कि उठ पड़ें असंख्‍य हाथ
चल पड़ो कि चल पड़ें असंख्‍य पैर साथ
मुस्‍कुरा उठे क्षितिज पे भोर की किरन
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़िन्दगी ने एक दिन कहा कि तुम बहो,
तुम बहो, तुम बहो
रुधिर प्रवाह की तरह बहो कि लालिमा
मिटा सके कलंक की सितम की कालिमा
बहो कि ख़ुशी कै़द कभी की न जा सके
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़िन्दगी ने एक दिन कहा कि तुम जलो,
तुम जलो, तुम जलो
तुम जलो कि रौशनी के पंख फड़फड़ा उठें
कुचल दिये गये दिलों के तार झनझना उठें
सुषुप्‍त आत्‍मा जगे, गरज उठे
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़िन्दगी ने एक दिन कहा कि तुम रचो,
तुम रचो, तुम रचो
तुम रचो हवा, पहाड़, रौशनी नयी
ज़िन्दगी नयी महान आत्‍मा नयी
सांस-सांस भर उठे अमिट सुगन्‍ध से
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

- शशि प्रकाश

Friday, October 8, 2010

ईश्वर की सत्ता में यकीन रखने वाले मित्रों से एक अपील!!!

सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञानी, सर्वत्र परमपिता परमेश्वर
जिनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता,
उनकी सत्ता में यकीन रखने वाले मेरे धार्मिक मित्रों!
मेरी तरफ़ से अपने परमपिता से कुछ सवाल करोगे क्या?

मुझे तो अधर्मी, काफ़िर होने के संगीन जुर्म में
बिना सुनवाई के, हिटलरशहाना अंदाज़ में
नरक के कंसन्ट्रेशन कैम्प में भेज दिया जायेगा.
इसलिए जब कभी तुम्हे अपने परमपिता के
दुर्लभ दर्शन होने का सौभाग्य प्राप्त हो,
या फिर जब तुम्हे आलीशान स्वर्ग की ओर ले जाया जा रहा हो,
उस समय मेरी तरफ़ से कुछ सवाल करोगे क्या?

उनसे पूछना कि जब हीरोशिमा और नागासाकी पर
शैतान अमेरिका गिरा रहा था परमाणु बम,
तो मानवता का कलेजा तो हो गया था छलनी छलनी ,
लेकिन महाशय के कानों में क्यों नहीं रेंगी जूँ तक?

फिर उनसे पूछना कि जब दिल्ली की सड़कों पर
कोंग्रेसी राक्षस मासूम सिखों का कर रहे थे कत्लेआम,
तब यह धरती तो काँप उठी थी
लेकिन बैकुंठ में क्यों नहीं हुई ज़रा सी भी हलचल?

उनसे यह भी पूछना कि जब गुजरात में
संघ परिवार के ख़ूनी दरिंदों द्वारा
मुस्लिम महिलाओं का हो रहा था सामूहिक बलात्कार,
तब इंसानियत तो हो गयी थी शर्मसार
पर जनाब के रूह में क्यों नहीं हुई थोड़ी भी हरकत?

और यह भी कि बरखुरदार किस करवट सो रहे होते हैं
जब उनके मंदिर के नाम पर गिराई जाती है मस्जिद,
जब ज़िहाद के नाम पर क़त्ल किये जा रहे होते हैं निर्दोष नागरिक?

आख़िर मालिक क्यों नहीं होते टस से मस?
जब मुनाफ़े कि वहशियाना हवस को मिटाने कि ख़ातिर
मिल मालिक जोंक कि तरह चूस रहे होते हैं मज़दूरों का खून.

योर ऑनर किस जुर्म कि सज़ा देते हैं
भूकंप और सूनामी पीड़ितों को?

पूछने को तो और भी बहुत कुछ है,
जैसे कि वियतनाम,फिलिस्तीन,अफगानिस्तान, इराक और अब पकिस्तान..

लेकिन मुझे लगता नहीं कि तुम कर पाओगे इतना साहस
आखिर तुम्हे अपने स्वर्ग और मोक्ष की परवाह है,
भले ही इस दुनिया में लोग जी रहे हों नरक से भी बदतर ज़िन्दगी
इससे तुम्हे क्या फ़र्क पड़ता है कि इस दुनिया में है इतनी अशांति
तुम्हे तो बस अपनी मानसिक शांति कि फ़िक्र है.

आख़िर तुम हो तो इसी व्यवस्था की उपज
जहाँ लोगों के दिमाग में ठूसा जाता है बस अपने लिए जीना
लेकिन मैं भी तो हूँ इसी व्यवस्था की उपज
मैं खुले आम करता हूँ विद्रोह
न सिर्फ इहलोक की ज़ालिम सत्ता के ख़िलाफ़
बल्कि परलोक की अमानवीय सत्ता के भी ख़िलाफ़.
क्योंकि अब हो चला है मुझे यक़ीन
कि हर तरह के अन्याय के ख़िलाफ़
विद्रोह न्यायसंगत और मानवीय है! 


- आनन्‍द सिंह